0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ईश्वर के सर्वस्वामी होने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [विद्वान्]पुरुष (वै) निश्चय करके (दितेः) दिति [नाशवान् सृष्टि] का (च च) और (अदितेः) [अदिति अविनाशी परमाणुरूप सामग्री] का (च) और (इडायाः) इड़ा [वेदवाणी] का (च)और (इन्द्राण्याः) इन्द्राणी [जीव की शक्ति] का (प्रियम्) प्रिय (धाम) धाम [घर] (भवति) होता है, (यः) जो [विद्वान्] (एवम्) ऐसे वा व्यापक [व्रात्य परमात्मा] को (वेद) जानता है ॥२१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की अपार, अनादि और अनन्त शक्ति है, मनुष्य जितना-जितना खोजता है, उतना-उतना ही जगदीश्वरकी सृष्टि और परमाणुरूप सामग्री को अनादि अनन्त ही पाता जाता है और वेद द्वाराअपनी शक्ति बढ़ाता हुआ आनन्द मनाता चला चलता है ॥१९, २०, २१॥
टिप्पणी: २०, २१−(तम्)व्रात्यम् (दितिः) दो अवखण्डने-क्तिच्। खण्डिता विकृतिः। कार्यरूपा नाशशीलासृष्टिः (अदितिः) दो अवखण्डने-क्तिन्। अखण्डिता प्रकृतिः। अविनाशिनी परमाणुरूपासामग्री (इडा) वेदवाणी निघ० १।११ (इन्द्राणी) इन्द्रस्य जीवस्य पत्नी विभूतिःशक्तिः। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥
