0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ईश्वर के सर्वस्वामी होने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (लोकाः) सब लोक (च च)और (लौक्याः) लोकों में रहनेवाले (च) और (ऋतवः) ऋतुएँ (च) और (आर्तवाः) ऋतुओंमें उत्पन्न हुए पदार्थ (च) और (मासाः) महीने (च) और (अर्धमासाः) आधे महीने (च)और (अहोरात्रे) दिन राति (तम्) उस [व्रात्य परमात्मा] के (अनुव्यचलन्) पीछेविचरे ॥१७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य को योग्य है किपरमात्मा को सब लोकों, लोकवालों और ऋतुओं आदि का स्वामी जानकर सब पदार्थों काविवेकी होवे और उन से यथावत् उपकार लेकर आनन्द पावे ॥१६, १७, १८॥
टिप्पणी: १७, १८−(तम्)व्रात्यम् (ऋतवः) वसन्तादयः (आर्तवाः) ऋतुभवाः पदार्थाः (लोकाः) भुवनानि (लौक्याः) लोक-ण्य। लोकभवाः पदार्थाः (मासाः) (अर्धमासाः) (अहोरात्रे)रात्रिदिने। अन्यत् पूर्ववत् सुगमं च ॥
