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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ईश्वर के सर्वस्वामी होने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (आहवनीयः) [यज्ञ कीअग्निविशेष] (च च) और (गार्हपत्यः) गार्हपत्य [गृहपति की सिद्ध हुई यज्ञाग्निविशेष] (च) और (दक्षिणाग्निः) दक्षिण अग्नि [यज्ञाग्निविशेष] (च) और (यज्ञः)यज्ञ (च) और (यजमानः) यजमान [यज्ञकर्ता] (च) और (पशवः) सब प्राणी (तम्) उस [व्रात्य परमात्मा] के (अनुव्यचलन्) पीछे विचरे ॥१४॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य परमात्मामें ध्यान लगा कर संसार के उपकारी अग्निहोत्र आदि यज्ञ तथा विद्यादान औरविद्वानों के सत्कार आदि यज्ञ करता है, वह परमात्मा का भक्त संसार में अतिप्रशंसनीय होता है ॥१३, १४, १५॥
टिप्पणी: १४, १५−(तम्)व्रात्यम् (आहवनीयः) आङ्+हु दानादानादनेषु-अनीयर्। यज्ञाग्निविशेषः (गार्हपत्यः)गृहपतिना संयुक्तो यज्ञाग्निविशेषः (दक्षिणाग्निः) यज्ञाग्निविशेषः (यज्ञः)सद्व्यवहारः (यजमानः) यज्ञकर्ता (पशवः) सर्वे प्राणिनः। अन्यत् पूर्ववत् सुगमं च॥
