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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ईश्वर के सर्वस्वामी होने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [विद्वान्]पुरुष (वै) निश्चय करके (इतिहासस्य) इतिहास का (च च) और (पुराणस्य) पुराण का (च) और (गाथानाम्) गाथाओं का (च) और (नाराशंसीनाम्) नाराशंसियों का (प्रियम्) प्रिय (धाम) धाम [घर] (भवति) होता है, (यः) जो [विद्वान्] (एवम्) ऐसे वा व्यापक [व्रात्य परमात्मा] को (वेद) जानता है ॥१२॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य परमात्मा केगुण कर्म स्वभाव के साथ उत्तम मनुष्यों के गुण कर्म स्वभाव का उपदेश करता है, वहइतिहास पुराण आदि द्वारा कीर्ति पाता है ॥१०, ११, १२॥मन्त्र १०-१२ महर्षिदयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका वेदसंज्ञाविचार पृष्ठ ८२ में उद्धृत हैं ॥
टिप्पणी: ११, १२−(तम्)व्रात्यम् (इतिहासः) इतिह पारम्पार्य्योपदेश आस्तेऽस्मिन्। इतिह+आस उपवेशनेविद्यमानतायां च-घञ्। महापुरुषाणां वृत्तान्तः (च) (पुराणम्) प्राचीनपुरुषाणांवृत्तान्तः (च) (गाथाः) उपिकुषिगार्तिभ्यस्थन्। उ० २।४। गै गाने-थन्। गानयोग्यावेदमन्त्राः। शिक्षाप्रदाः श्लोकादयः (नाराशंसीः) अ० १४।१।७। नर+शंसुस्तुतौ-अण्। दीर्घश्च, ततः स्वार्थे-अण्, ङीप्। येन नराः प्रशस्यन्ते स नाराशंसोमन्त्रः-निरु० ९।९। वीरनराणां कीर्तनानि (अनुव्यचलन्) अनुसृत्य व्यचरन्। अन्यत्पूर्ववत् स्पष्टं च ॥
