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स बृ॑ह॒तींदिश॒मनु॒ व्यचलत् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स: । बृहतीम् । दिशम् । अनु । वि । अचलत् ॥६.१०॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:6» पर्यायः:0» मन्त्र:10


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ईश्वर के सर्वस्वामी होने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [व्रात्यपरमात्मा] (बृहतीम्) बड़ी (दिशम् अनु) दिशा की ओर (वि अचलत्) विचरा ॥१०॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य परमात्मा केगुण कर्म स्वभाव के साथ उत्तम मनुष्यों के गुण कर्म स्वभाव का उपदेश करता है, वहइतिहास पुराण आदि द्वारा कीर्ति पाता है ॥१०, ११, १२॥मन्त्र १०-१२ महर्षिदयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका वेदसंज्ञाविचार पृष्ठ ८२ में उद्धृत हैं ॥
टिप्पणी: १०−(सः) व्रात्यःपरमात्मा (बृहतीम्) प्रवृद्धाम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥