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नास्य॑ प॒शून्न स॑मा॒नान्हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

न । अस्य । पशून् । न । समानम् । हिनस्ति । य: । एवम् । वेद ॥५.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:3


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमात्माके अन्तर्यामी होने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (हिनस्ति) कष्ट देताहै, (न) न (अस्य) उस [विद्वान्] के (पशून्) प्राणियों को और (न) न (समानान्) [उसके] तुल्य गुणवालों को [कष्ट देता है], (यः) जो [विद्वान्] (एवम्) ऐसे वाव्यापक [व्रात्य परमात्मा] को (वेद) जानता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - विद्वानों का मत है किजो मनुष्य परमात्मा को सर्वव्यापक सर्वान्तर्यामी जानकर सदा सर्वत्र पुरुषार्थकरके उसका आज्ञाकारी रहता है, वह सर्वशक्तिमान् परमेश्वर सब विघ्न हटाकर उस परउसके अनुगामियों पर अनुग्रह करता है ॥१-३॥
टिप्पणी: ३−(न) निषेधे (अस्य) विदुषः (पशून्)प्राणिनः (न) (समानान्) तुल्यगुणान् पुरुषान् (हिनस्ति) दुःखयति (यः) विद्वान् (एवम्) ईदृशं व्यापकं वा व्रात्यं परमात्मानम् (वेद) जानाति ॥