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भव॑ एनमिष्वा॒सःप्राच्या॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद॑नुष्ठा॒तानु॑ तिष्ठति नैनं॑ श॒र्वो नभ॒वो नेशा॑नः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

भव: । एनम् । इषुऽआस: । प्राच्या: । दिश: । अन्त:ऽदेशात् । अनुऽस्थाता । अनु । तिष्ठति । न । एनम् । शर्व: । न । भव: । न । ईशान: ॥५.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमात्माके अन्तर्यामी होने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (भवः) सर्वत्रवर्तमान, (इष्वासः) हिंसानिवारक, (अनुष्ठाता) साथ रहनेवाला परमात्मा (प्राच्याःदिशः) पूर्व दिशा के (अन्तर्देशात्) मध्य देश से (एनम् अनु) उस [विद्वान्] केसाथ (तिष्ठति) रहता है, और (एनम्) उस [विद्वान्] को (न) न (शर्वः) दुःखनाशक, (न) न (भवः) सर्वत्र वर्तमान और (न) न (ईशानः) सर्वस्वामी परमेश्वर ॥२॥
भावार्थभाषाः - विद्वानों का मत है किजो मनुष्य परमात्मा को सर्वव्यापक सर्वान्तर्यामी जानकर सदा सर्वत्र पुरुषार्थकरके उसका आज्ञाकारी रहता है, वह सर्वशक्तिमान् परमेश्वर सब विघ्न हटाकर उस परउसके अनुगामियों पर अनुग्रह करता है ॥१-३॥
टिप्पणी: २−(भवः) सर्वत्रवर्तमानः (एनम्) विद्वांसम् (इष्वासः) हिंसानाशकः (प्राच्याः) (दिशः) (अन्तर्देशात्) (अनुष्ठाता) सहवर्तमानः (अनु) अनुलक्ष्य (तिष्ठति) वर्तते (न)निषेधे (शर्वः) दुःखनाशकः परमेश्वरः (न) (भवः) (न) (ईशानः) सर्वेश्वरः ॥