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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्माके अन्तर्यामी होने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (हिनस्ति) कष्ट देताहै, (न) न (अस्य) उस [विद्वान्] के (पशून्) प्राणियों को और (न) न [उसके] (समानान्) तुल्य गुणवालों को [कष्ट देता है], (यः) जो [विद्वान्] (एवम्) ऐसे वाव्यापक [व्रात्य परमात्मा] को (वेद) जानता है ॥१६॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १-३ के समान है॥१४, १५, १६॥
टिप्पणी: १४, १५, १६−(अन्तर्देशेभ्यः) मध्यदेशेभ्यः (ईशानम्) सर्वस्वामिनम्। अन्यत् पूर्ववत्-म०१-३, स्पष्टं च ॥
