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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्माके अन्तर्यामी होने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तस्मै) उस [विद्वान्]के लिये (प्राच्याः दिशः) पूर्वदिशा के (अन्तर्देशात्) मध्यदेश से (भवम्)सर्वत्र वर्तमान परमेश्वर को (इष्वासम्) हिंसानाशक, (अनुष्ठातारम्) अनुष्ठाता [साथ रहनेवाला] (अकुर्वन्) उन [विद्वानों] ने बनाया ॥१॥
भावार्थभाषाः - विद्वानों का मत है किजो मनुष्य परमात्मा को सर्वव्यापक सर्वान्तर्यामी जानकर सदा सर्वत्र पुरुषार्थकरके उसका आज्ञाकारी रहता है, वह सर्वशक्तिमान् परमेश्वर सब विघ्न हटाकर उस परउसके अनुगामियों पर अनुग्रह करता है ॥१-३॥
टिप्पणी: १−(तस्मै) विदुषे (प्राच्याः) पूर्वायाः (दिशः) (अन्तर्देशात्) मध्यदेशात् (भवम्) सर्वत्रवर्तमानं परमेश्वरम् (इष्वासम्) ईषेः किच्च। उ० १।१३। ईष हिंसायाम्-उ प्रत्ययः, कित् ह्रस्वश्च, इषु+असु क्षेपे-अण्। हिंसायाः क्षेपकं नाशकम् (अनुष्ठातारम्)सहवर्तमानम् (अकुर्वन्) ते विद्वांसः कृतवन्तः ॥
