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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर के रक्षा गुण का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वार्षिकौ) वर्षावाले (मासौ) दोनों महीने (प्रतीच्याः दिशः) पश्मिमी दिशा से (एनम्) उस [विद्वान्] की (गोपायतः) रक्षा करते हैं, (च) और [दोनों] (वैरूपम्) वैरूप [विविध पदार्थों काजतानेवाला वेदज्ञान] (च) और (वैराजम्) वैराज [विराट् रूप अर्थात् बड़ेऐश्वर्यवान् वा प्रकाशमान परमात्मा का स्वरूप प्राप्त करानेवाला मोक्षज्ञान] [उसके लिये] (अनु तिष्ठतः) विहित कर्म करते हैं, (यः) जो [विद्वान्] (एवम्)व्यापक [व्रात्यपरमात्मा] को (वेद) जानता है ॥९॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १-३ के समान है॥७-९॥
टिप्पणी: ८, ९−(वार्षिकौ)वर्षा-ठञ्। वर्षासम्बन्धिनौ श्रावणभाद्रौ (वैरूपम्) सू० २।१६। पदार्थानां रूपंनिरूपणं यस्मात् तद् वेदज्ञानम् (वैराजम्) सू० २।१६। विराड्रूपस्य ऐश्वर्यवतःप्रकाशमानस्य वा परमात्मस्वरूपस्य प्रतिपादकं मोक्षज्ञानम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥
