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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर के रक्षा गुण का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (शैशिरौ) शिशिरवाले (मासौ) दोनों महीने (ऊर्ध्वायाः दिशः) ऊँची दिशा से (एनम्) उस [विद्वान्] की (गोपायतः) रक्षा करते हैं, (च) और [दोनों] (द्यौः) आकाश (च) और (आदित्यः) सूर्य [उसके लिये] (अनु तिष्ठतः) विहित कर्म करते हैं, (यः) जो [विद्वान्] (एवम्)व्यापक [व्रात्य परमात्मा] को (वेद) जानता है ॥१८॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १-३ के समान है॥१६-१८॥
टिप्पणी: १७, १८−(शिशिरौ) शिशिरअण्। शिशिरसम्बन्धिनौ माघफाल्गुनौ (दिवम्) आकाशम् (आदित्यम्) आदीप्यमानंसूर्यम्। अन्यद् गतम् ॥
