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है॑म॒नौ मासौ॑गो॒प्तारा॒वकु॑र्व॒न्भूमिं॑ चा॒ग्निं चा॑नुष्ठा॒तारौ॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

हैमनौ । मासौ । गोप्तारौ । अकुर्वन् । भूमिम् । च । अग्निम् । च । अनुऽस्थातारौ ॥४.१४॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:14


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमेश्वर के रक्षा गुण का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (हैमनौ) शीतवाले [अग्रहायण-पौष] (मासौ) दो महीनों को (गोप्तारौ) दो रक्षक (अकुर्वन्) उन [विद्वानों] ने बनाया, (भूमिम्) भूमि (च च) और (अग्निम्) अग्नि [भौतिक अग्नि] को (अनुष्ठातारौ) दो अनुष्ठाता [साथ रहनेवाले वा कार्यसाधक] [बनाया] ॥१४॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १-३ के समान है॥१३-१५॥
टिप्पणी: १४, १५−(हैमनौ)सर्वत्राण् च तलोपश्च। पा० ४।३।२२। हेमन्त-अण्, तलोपः। शीतसम्बन्धिनौ।आग्रहायणपौषौ (भूमिम्) पृथिवीम् (अग्निम्) भौतिकाग्निम्। अन्यद् गतम् ॥