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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर के रक्षा गुण का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (शारदौ) शरद् ऋतुवाले [आश्विन-कार्तिक] (मासौ) दो महीनों को (गोप्तारौ) दो रक्षक (अकुर्वन्) उन [विद्वानों] ने बनाया, (च) और (श्यैतम्) श्यैत [सद्गति बतानेवाले वेदज्ञान] को (च) और (नौधसम्) नौधस [ऋषियों के हितकारी मोक्षज्ञान] को (अनुष्ठातारौ) दोअनुष्ठाता [साथ रहनेवाले वा कार्यसाधक] [बनाया] ॥११॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १-३ के समान है॥१०-१२॥
टिप्पणी: ११, १२−(शारदौ) शरत्सम्बन्धिनावाश्विनकार्त्तिकौ (श्यैतम्) सू० २।२२। श्येत-अण्। श्येतस्य सद्गतेःप्रतिपादकं वेदज्ञानम् (नौधसम्) सू० २।२२। नोधस्-अण्। नोधसाम् ऋषीणां हितकरंमोक्षज्ञानम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥
