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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा के विराट् रूप का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (साम) सामवेद [मोक्षज्ञान] (आसादः) [उस सिंहासन का] बैठने का स्थान और (उद्गीथः) उद्गीथ [अच्छे प्रकार गाने योग्य शब्द] (अपश्रयः) सहारा था ॥८॥
भावार्थभाषाः - जैसे सिंहासन मेंबैठने का स्थान और बैठनेवाले के सुख के लिये सहारे होते हैं, वैसे ही परमात्माने विद्वानों के लिये मुक्तिज्ञान और प्रणव का जप बनाया है ॥८॥
टिप्पणी: ८−(साम)मोक्षज्ञानम् (आसादः) आङ्+षद्लृ गतौ-घञ्। स्थितिस्थानम् (उद्गीथः) गश्चोदि। उ०२।१०। उत्+गै गाने-थक्। उच्चैर्गीयमानः सामध्वनिः प्रणवो वा (अपश्रयः) अप+श्रिञ्सेवायाम्-अच्। आश्रयः ॥
