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ऋचः॒प्राञ्च॒स्तन्त॑वो॒ यजूं॑षि ति॒र्यञ्चः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ऋच: । प्राञ्च: । तन्तव: । यजूंषि । तिर्यञ्च ॥३.६॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:6


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमात्मा के विराट् रूप का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋचः) ऋचाएँ [पदार्थों की गुणप्रकाशक विद्याएँ] [उस सिंहासन के] (प्राञ्चः) लम्बे फैले हुए (तन्तवः) तन्तु [सूत] और (यजूंषि) यजुर्मन्त्र (तिर्यञ्चः) तिरछे फैले हुए [तन्तु] थे ॥६॥
भावार्थभाषाः - जैसे वस्त्र के ताने-बाने में सूत लगते हैं, वैसे ही परमात्मा ने सृष्टिरचना में ऋग्वेद और यजुर्वेदविद्याएँ बनायी हैं ॥६॥
टिप्पणी: ६−(ऋचः) पदार्थविज्ञानप्रकाशिकाविद्याः (प्राञ्चः)प्र+अञ्चु गतिपूजनयोः-क्विन्। प्रकर्षेण प्राप्ताः (तन्तवः) सूत्राणि (यजूंषि)सत्कर्मप्रतिपादकानि ज्ञानानि (तिर्यञ्चः) तिरस्+अञ्चु गतिपूजनयोः-क्विन्।तिर्यग्भवास्तन्तवः ॥