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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा के विराट् रूप का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (बृहत्) बृहत् [बड़ाआकाश] (च च) और (रथन्तरम्) रथन्तर [रमणीय गुणों से पार होने योग्य जगत्] (अनूच्ये)दो पाटियाँ [पट्टियाँ, लंबे काष्ठ आदि जोड़] (च) और (यज्ञायज्ञियम्) सब यज्ञोंका हितकारी [वेदज्ञान] (च) और (वामदेव्यम्) वामदेव [श्रेष्ठ परमात्मा] से जतायागया [भूतपञ्चक] (तिरश्च्ये) दो सेरुवे [तिरछे काष्ठ आदि जोड़] (आस्ताम्) थे ॥५॥
भावार्थभाषाः - जैसे मनुष्यकृतसिंहासन में दो पाटी और दो सेरुवे होते हैं, वैसे ही परमेश्वर के सिंहासन केआकाश, जगत् आदि हैं ॥५॥
टिप्पणी: ५−(बृहत्) सू० २।२। प्रवृद्धमाकाशम् (रथन्तरम्) सू० २।२।रमणीयैर्गुणैस्तरणीयं जगत् (च) (अनूच्ये) अनु+उच समवाये-क्यप्। सिंहासनादौसंगमनीये लम्बमाने द्वे काष्ठादिवस्तुनी (आस्ताम्) अभवताम् (यज्ञायज्ञियम्) सू०२।१०। सर्वेभ्यो यज्ञेभ्यो हितं वेदज्ञानम् (च) (वामदेव्यम्) सू० २।१०।श्रेष्ठपरमेश्वरेण विज्ञापितं भूतपञ्चकम् (च) (तिरश्च्ये) तिरस्+च्युङ् गतौ-ड।अन्तर्गते लघुनी द्वे काष्ठादिवस्तुनी ॥
