पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा के विराट् रूप का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तस्मै) उस (व्रात्याय) व्रात्य [सब समूहों के हितकारी परमात्मा] के लिये (आसन्दीम्)सिंहासन (सम् अभरन्) उन्होंने मिलकर रक्खा ॥३॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग परस्परविचार करके आगे के मन्त्रों की युक्ति से उस परमेश्वर को सर्वोपरि विराजमानसमझें ॥३॥
टिप्पणी: ३−(तस्मै) तादृशाय (व्रात्याय) सर्वसमूहहितकारिणे परमात्मने (आसन्दीम्)सिंहासनम् (सम्) संगत्य (अभरन्) धारितवन्तो विद्वांसः ॥
