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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा के विराट् रूप का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (विश्वानि) सब (एव) ही (भूतानि) सत्तावाले पदार्थ (अस्य) उस [विद्वान् पुरुष] के (उपसदः) समीपवर्ती (भवन्ति) होते हैं, (यः) जो (एवम्) व्यापक [व्रात्य परमात्मा] को (वेद) जानता है॥११॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य पूर्वोक्तप्रकार से परमात्मा के तत्त्व को जान लेता है, वह योगीश्वर सब सत्तावालों सेयथावत् उपकार कर सकता है ॥११॥
टिप्पणी: ११−(विश्वानि) सर्वाणि (एव) अवधारणे (अस्य) विदुषःपुरुषस्य (भूतानि) सत्त्वानि (उपसदः) समीपवर्तिनः (भवन्ति) (यः) पुरुषः (एवम्)सू० २।३। व्यापकं व्रात्यं परमात्मानम् (वेद) वेत्ति ॥
