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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा के विराट् रूप का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (देवजनाः) विद्वान्लोग (तस्य) उस [व्रात्य परमात्मा] के (परिष्कन्दाः) सेवक, (संकल्पाः) सङ्कल्प [दृढ़ विचार] (प्रहाय्याः) [उसके] दूत, और (विश्वानि) सब (भूतानि) सत्ताएँ [उसके] (उपसदः) निकटवर्ती (आसन्) थे ॥१०॥
भावार्थभाषाः - जैसे सिंहासन पर बैठेहुए राजराजेश्वर के सेवक, दूत और अन्य समीपवर्ती होते हैं, वैसे ही वह परमात्मासब विद्वानों, दृढसंकल्पी लोगों और सब सत्ताओं को अपनी कृपादृष्टि में रखताहै ॥१०॥
टिप्पणी: १०−(तस्य) व्रात्यस्य (देवजनाः) विद्वांसः पुरुषाः (परिष्कन्दाः)परि+स्कन्दिर् गतिशोषणयोः-घञ्। परपुष्टः। परिचराः (आसन्) (संकल्पाः) दृढविचाराः (प्रहाय्याः) श्रदुक्षिस्पृहिगृहिभ्य आय्यः। उ० ३।९६। ओहाङ्-गतौ-आय्य।प्रगन्तारः। दूताः (विश्वानि) सर्वाणि (भूतानि) सत्त्वानि। सत्तासमन्वितानिपदार्थजातानि (उपसदः) समीपवर्तिनः ॥
