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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर की सर्वत्र व्यापकता का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [व्रात्यपरमात्मा] (उत् अतिष्ठत्) खड़ा हुआ, (सः) वह (दक्षिणाम्) दाहिनी [वा दक्षिण] (दिशम् अनु) दिशा की ओर (वि अचलत्) विचरा ॥९॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमात्मा कोअपनी दाहिनी वा दक्षिण दिशा में व्यापक जानकर आगे बढ़े ॥९॥
टिप्पणी: ९−(दक्षिणाम्)अवामभागस्थाम्। दक्षिणस्थाम्। अन्यत्पूर्ववत्-म० १ ॥
