वांछित मन्त्र चुनें

की॒र्तिश्च॒यश॑श्च पुरःस॒रावैनं॑ की॒र्तिर्ग॑च्छ॒त्या यशो॑ गच्छति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कीर्ति: । च । यश: । च । पुर:ऽसरौ । आ । एनम् । कीर्ति: । गच्छति । आ । यश: । गच्छति । य: । एवम् । वेद ॥२.८॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:8


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमेश्वर की सर्वत्र व्यापकता का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (कीर्तिः) कीर्ति [दानआदि से बड़ाई] (च च) और (यशः) यश [शूरता आदि से बड़ाई] (पुरः सरौ) दो अग्रधावक [पावक समान] हैं, (एनम्) उस [विद्वान्] को (कीर्तिः) कीर्ति [दान आदि से बड़ाई] (आ) आकर (गच्छति) मिलती है, (यशः) यश [शूरता आदि से बड़ा नाम] (आ) आकर, (गच्छति)मिलता है, (यः) जो [विद्वान्] (एवम्) ऐसे वा व्यापक [व्रात्य परमात्मा] को (वेद)जानता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - जब मनुष्य योगाभ्यासकरके शुद्ध ज्ञान द्वारा परमाणु से लेकर परमेश्वर तक साक्षात् करलेता है, वहपूर्णकाम और पूर्णविज्ञानी होकर संसार में अपने आप कीर्ति और यश पाता है॥४-८॥
टिप्पणी: ८−(कीर्तिः) दानादिप्रभवा ख्यातिः (च) (यशः) दानादिप्रभवं नाम (च) (पुरःसरौ) अग्रधावकौ (आ) आगत्य (एनम्) विद्वांसम् (कीर्तिः) (गच्छति) प्राप्नोति (आ) (यशः) (गच्छति) (यः) विद्वान् पुरुषः (एवम्) म० ३। ईदृशं व्यापकं वापरमात्मानम् (वेद) जानाति ॥