देवता: त्रिपदा प्राजापत्या त्रिष्टुप्
ऋषि: अध्यात्म अथवा व्रात्य
छन्द: अथर्वा
स्वर: अध्यात्म प्रकरण सूक्त
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर की सर्वत्र व्यापकता का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (कीर्तिः) कीर्ति [दानआदि से बड़ाई] (च च) और (यशः) यश [शूरता आदि से बड़ाई] (पुरः सरौ) दो अग्रधावक [पावक समान] हैं, (एनम्) उस [विद्वान्] को (कीर्तिः) कीर्ति [दान आदि से बड़ाई] (आ) आकर (गच्छति) मिलती है, (यशः) यश [शूरता आदि से बड़ा नाम] (आ) आकर, (गच्छति)मिलता है, (यः) जो [विद्वान्] (एवम्) ऐसे वा व्यापक [व्रात्य परमात्मा] को (वेद)जानता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - जब मनुष्य योगाभ्यासकरके शुद्ध ज्ञान द्वारा परमाणु से लेकर परमेश्वर तक साक्षात् करलेता है, वहपूर्णकाम और पूर्णविज्ञानी होकर संसार में अपने आप कीर्ति और यश पाता है॥४-८॥
टिप्पणी: ८−(कीर्तिः) दानादिप्रभवा ख्यातिः (च) (यशः) दानादिप्रभवं नाम (च) (पुरःसरौ) अग्रधावकौ (आ) आगत्य (एनम्) विद्वांसम् (कीर्तिः) (गच्छति) प्राप्नोति (आ) (यशः) (गच्छति) (यः) विद्वान् पुरुषः (एवम्) म० ३। ईदृशं व्यापकं वापरमात्मानम् (वेद) जानाति ॥
