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मा॑त॒रिश्वा॑ च॒पव॑मानश्च विपथवा॒हौ वातः॒ सार॑थी रे॒ष्मा प्र॑तो॒दः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मातरिश्वा । च । पवमान: । च । विपथऽवाहौ । वात: । सारथि: । रेष्मा । प्रऽतोद: ॥२.७॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:7


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमेश्वर की सर्वत्र व्यापकता का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (मातरिश्वा) आकाश मेंघूमनेवाला सूत्रात्मा [वायु विशेष] (च च) और भी (पवमानः) संशोधक वायु (विपथवाहौ)दो रथ ले चलनेवाले [बैल घोड़े आदि समान], (वातः) वात [सामान्य वायु] (सारथिः)सारथी [रथ हाँकनेवाले के समान] (रेष्मा) आँधी (प्रतोदः) अङ्कुश [कोड़ा, पैनासमान] ॥७॥
भावार्थभाषाः - जब मनुष्य योगाभ्यासकरके शुद्ध ज्ञान द्वारा परमाणु से लेकर परमेश्वर तक साक्षात् कर लेता है, वहपूर्णकाम और पूर्ण विज्ञानी होकर संसार में अपने आप कीर्ति और यश पाता है॥४-८॥
टिप्पणी: ७−(मातरिश्वा) आकाशेगमनशीलः सूत्रात्मा वायुः (च) (पवमानः) संशोधको वायुः (च) (विपथवाहौ) रथवाहकौवृषभौ यथा (वातः) सामान्यपवनः (सारथिः) सर्तेर्णिच्च। उ० ४।८९। सृ गतौ-घथिन्, णित्। रथचालकः (रेष्मा) रिष हिंसायाम्-मनिन्। प्रचण्डवायुः (प्रतोदः) तुद-घञ्।अश्वादिताडनदण्डः ॥