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भू॒तं च॑भवि॒ष्यच्च॑ परिष्क॒न्दौ मनो॑ विप॒थम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

भूतम् । च । भविष्यत् । च । परिऽस्कन्दौ । मन: । विऽपथम् ॥२.६॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:6


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमेश्वर की सर्वत्र व्यापकता का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (भूतम्) भूत [बीताहुआ] (च च) और भी (भविष्यत्) भविष्यत् [आनेवाला] (परिष्कन्दौ) [सब ओर चलनेवाले]दो सेवक [समान], (मनः) मन (विपथम्) विविध मार्गगामी रथ [यान आदि समान] ॥६॥
भावार्थभाषाः - जब मनुष्य योगाभ्यासकरके शुद्ध ज्ञान द्वारा परमाणु से लेकर परमेश्वर तक साक्षात् कर लेता है, वहपूर्णकाम और पूर्ण विज्ञानी होकर संसार में अपने आप कीर्ति और यश पाता है॥४-८॥
टिप्पणी: ६−(भूतम्) अतीतम् (च) (भविष्यत्) अनागतम् (च) (परिष्कन्दौ) स्कन्दिर् गतिशोषणयोः-घञ्। परितो गन्तारौपरपुष्टौ। सेवकौ यथा (मनः) चित्तम् (विपथम्) विविधगमनं यानम् ॥