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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर की सर्वत्र व्यापकता का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (मातरिश्वा) आकाश मेंघूमनेवाला सूत्रात्मा [वायु विशेष] (च च) और भी (पवमानः) संशोधक वायु (विपथवाहौ) दो रथ ले चलनेवाले [बैल घोड़े आदि समान], (वातः) वात [सामान्य वायु] (सारथिः)सारथी [रथ हाँकनेवाले के समान] (रेष्मा) आँधी (प्रतोदः) अंकुश [कोड़ा, पैनासमान] ॥२७॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य परमात्मामें लवलीन होता है, वही वेदज्ञान और मोक्षज्ञान से जितेन्द्रिय और सर्वहितैषीहोकर संसार में सब पदार्थों से उपकार लेकर आनन्द पाता है ॥२४-२८॥
टिप्पणी: २७−यथा मन्त्रः ७ ॥
