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वि॒द्युत्पुं॑श्च॒ली स्त॑नयि॒त्नुर्मा॑ग॒धो वि॒ज्ञानं॒ वासोऽह॑रु॒ष्णीषं॒रात्री॒ केशा॒ हरि॑तौ प्रव॒र्तौ क॑ल्म॒लिर्म॒णिः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

विऽद्युत् । पुंश्चली । स्तनयित्नु: । मागध: । विऽज्ञानम् । वास: । अह: । उष्णीषम् । रात्री । केशा: । हरितौ । प्रऽवर्तौ । कल्मलि: । मणि: ॥२.२५॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:25


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमेश्वर की सर्वत्र व्यापकता का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (विद्युत्) बिजुली [बिजुली समान चञ्चलता] (पुंश्चली) पुंश्चली [पर पुरुषों में जानेवाली व्यभिचारिणीस्त्री तथा परस्त्रीगामी व्यभिचारी पुरुष के समान घृणित], (स्तनयित्नुः) मेघ कीगर्जन (मागधः) भाट [स्तुतिपाठक के समान], (विज्ञानम्) विज्ञान [विवेक] (वासः)वस्त्र [समान], (अहः) दिन (उष्णीषम्) [धूप रोकनेवाली] पगड़ी [समान], (रात्री)रात्री (केशाः) केश [समान], (हरितौ) दोनों धारण आकर्षण गुण (प्रवर्तौ) दोगोलकुण्डल [कर्णभूषण समान] और (कल्मलिः) [गति देनेवाली] तारा गुणों की झलक (मणिः) मणि [मणियों के हार समान] ॥२५॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य परमात्मामें लवलीन होता है, वही वेदज्ञान और मोक्षज्ञान से जितेन्द्रिय और सर्वहितैषीहोकर संसार में सब पदार्थों से उपकार लेकर आनन्द पाता है ॥२४-२८॥
टिप्पणी: २५−(विद्युत्)तडिद्वच्चञ्चलता (स्तनयित्नुः) मेघगर्जनम्। शेषं गतम्-म० ५ ॥