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श्यै॒ताय॑ च॒ वैस नौ॑ध॒साय॑ च सप्त॒र्षिभ्य॑श्च॒ सोमा॑य च॒ राज्ञ॒ आ वृ॑श्चते॒ य ए॒वंवि॒द्वांसं॒ व्रात्य॑मुप॒वद॑ति ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

श्यैताय । च । वै । स: । नौधसाय । च । सप्तर्षिऽभ्य:। च । सोमाय । च । राज्ञे । आ । वृश्चते । य: । एवम् । विद्वांसम् । व्रात्यम् । उपऽवदति ॥२.२३॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:23


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमेश्वर की सर्वत्र व्यापकता का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [मूर्ख] (वै)निश्चय करके (श्यैताय) श्यैत [सद्गति बतानेवाले वेदज्ञान] के लिये (च च) और भी (नौधसाय) नौधस [ऋषियों के हितकारी मोक्षज्ञान] के लिये (च) और (सप्तर्षिभ्यः)सात ऋषियों [छह इन्द्रियों और सातवीं बुद्धि-म० २२] के लिये (च) और (राज्ञे)ऐश्वर्यवान् (सोमाय) प्रेरक जीव [मनुष्य] के लिये (आ) सब प्रकार (वृश्चते) दोषीहोता है, (यः) जो [मूर्ख] (एवम्) व्यापक (विद्वांसम्) ज्ञानवान् (व्रात्यम्)व्रात्य [सब समूहों के हितकारी परमात्मा] को (उपवदति) बुरा कहता है ॥२३॥
भावार्थभाषाः - कृतघ्न अज्ञानी पुरुषवेदज्ञान और मोक्षज्ञान को नहीं प्राप्त कर सकता और न वह जितेन्द्रिय और हितैषीहो सकता, इसी से वह सदा दुःख में पड़ा रहता है ॥२३॥
टिप्पणी: २३−(श्यैताय) म० २२।सद्गतिप्रापकाय वेदज्ञानाय (नौधसाय) म० २२। ऋषीणां हितकराय मोक्षज्ञानाय (सप्तर्षिभ्यः) सबुद्धिषडिन्द्रियेभ्यः (सोमाय) प्रेरकाय मनुष्याय (राज्ञे)ऐश्वर्यवते। अन्यत् पूर्ववत्-म० ३ ॥