पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर की सर्वत्र व्यापकता का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (बृहत्) बृहत् [बड़ाआकाश] (च च) और (रथन्तरम्) रथन्तर [रमणीय गुणों द्वारा पार होने योग्य जगत्] (च)और (आदित्याः) सब चमकनेवाले सूर्य आदि (च) और (विश्वे) सब (देवाः) गतिवाले लोक (तम्) उस [व्रात्य परमात्मा] के (अनुव्यचलन्) पीछे-पीछे विचरे ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य को चाहिये किआकाश, भूमि, सूर्य, और सब चलते हुए लोकों को परमात्मा की आज्ञा में चलता हुआसाक्षात् करे ॥२॥
टिप्पणी: २−(तम्) व्रात्यं परमात्मानम् (बृहत्) प्रवृद्धमाकाशम् (च) (रथन्तरम्) अ० ८।१०(२)।६। रमु क्रीडायाम्-क्थन्+तॄ प्लवनतरणयोः-खच् मुम् च।रमणीयैर्गुणैस्तरणीयं जगत् (च) (आदित्याः) आदीप्यमानाः सूर्यादिलोकाः (च) (विश्वे)सर्वे (च) (देवाः) दिवु गतौ-पचाद्यच्। गतिमन्तो लोकाः (अनुव्यचलन्) अनुसृत्यव्यचरन् ॥
