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इरा पुं॑श्च॒लीहसो॑ माग॒धो वि॒ज्ञानं॒ वासोऽह॑रु॒ष्णीषं॒ रात्री॒ केशा॒ हरि॑तौ प्रव॒र्तौक॑ल्म॒लिर्म॒णिः ॥

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पद पाठ

ईरा । पुंश्चली । हस: । मागध: । विऽज्ञानम् । वास: । अह: । उष्णीषम् । रात्री । केशा: । हरितौ । प्रऽवर्तौ । कल्मलि: । मणि: ॥२.१९॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:19


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमेश्वर की सर्वत्र व्यापकता का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (इरा) मदिरा [मद्यवस्तु] (पुंश्चली) पुंश्चली [पर पुरुषों में जानेवाली व्यभिचारिणी स्त्रीतथा परस्त्रीगामी व्यभिचारी पुरुष के समान घृणित], (हसः) हास्यरस (मागधः) भाट [स्तुतिपाठक के समान], (विज्ञानम्) विज्ञान [विवेक] (वासः) वस्त्र [समान], (अहः)दिन (उष्णीषम्) [धूप रोकनेवाली] पगड़ी [समान], (रात्री) रात्री (केशाः) केश [समान], (हरितौ) दोनों धारण आकर्षण गुण (प्रवर्तौ) दो गोलकुण्डल [कर्णभूषण समान]और (कल्मलिः) [गति देनेवाली] तारों की झलक (मणिः) मणि [मणियों के हार समान]॥१–९॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य वेदज्ञान औरमोक्षज्ञान द्वारा परमात्मा के प्राप्त करके दुष्कर्मों के सर्वथा त्याग औरसत्कर्मों के निरन्तर निष्काम अनुष्ठान से संसार में आनन्द पाता है ॥१˜८, १९, २०॥
टिप्पणी: १–९−(इरा)ऋज्रेन्द्राग्रवज्रविप्र०। उ० २।२८। इण् गतौ-रन्, टाप्, गुणाभावः। मद्यं वस्तु।मदिरा। इरा भूवाक्सुराप्सु स्यात्। अमर० २३।१७६। अन्यत् पूर्ववत्-म० ५ ॥