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उषाः पुं॑श्च॒लीमन्त्रो॑ माग॒धो वि॒ज्ञानं॒ वासोऽह॑रु॒ष्णीषं॒ रात्री॒ केशा॒ हरि॑तौ प्रव॒र्तौक॑ल्म॒लिर्म॒णिः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उषा: । पुंश्चली । मन्त्र: । मागध: । विऽज्ञानम् । वास: । अह: । उष्णीषम् । रात्री । केशा: । हरितौ । प्रऽवर्तौ । कल्मलि: । मणि: ॥२.१३॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:13


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमेश्वर की सर्वत्र व्यापकता का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (उषाः) हिंसा (पुंश्चली) पुंश्चली [पर पुरुषों में जानेवाली व्यभिचारिणी स्त्री, तथापरस्त्रीगामी व्यभिचारी पुरुष के समान घृणित], (मन्त्रः) मननगुण (मागधः) भाट [स्तुतिपाठक के समान], (विज्ञानम्) विज्ञान [विवेक] (वासः) वस्त्र [समान], (अहः)दिन (उष्णीषम्) [धूप रोकनेवाली] पगड़ी [समान], (रात्री) रात्री (केशाः) केश [समान], (हरितौ) दोनों धारण आकर्षण गुण (प्रवर्तौ) दो गोल कुण्डल [कर्णभूषणसमान] और (कल्मलिः) [गति देनेवाली] तारों की झलक (मणिः) मणि [मणियों के हारसमान] ॥१–३॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य परमात्मा केज्ञान के साथ अविद्या के त्याग और विद्या की प्राप्ति से योग्य पदार्थों केउपकार और अयोग्यों के अपकार को जानकर अपना कर्तव्य करता है, वह संसार मेंकीर्तिमान् और यशस्वी होता है ॥१२-१–४॥
टिप्पणी: १३−(उषाः) उषः किच्च।उ० ४।२३४। उष दाहे वधे च-असि। हिंसा (मन्त्रः) सर्वधातुभ्यः ष्ट्रन्। उ० ४।१५९।मन ज्ञाने-ष्ट्रन्। मननगुणः। अन्यत् पूर्ववत्-म० ५ ॥