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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर की सर्वत्र व्यापकता का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यज्ञायज्ञियम्) सबयज्ञों का हितकारी [वेदज्ञान] (च च) और (वामदेव्यम्) वामदेव [श्रेष्ठ परमात्मा]से जताया गया [भूतपञ्चक] (च) और (यज्ञः) यज्ञ [पूजनीय व्यवहार] (च) और (यजमानः)यजमान [पूजनीय व्यवहार करनेवाला पुरुष] (च) और (पशवः) सब जीव-जन्तु (तम्) उस [परमात्मा] के (अनुव्यचलन्) पीछे-पीछे विचरे ॥१०॥
भावार्थभाषाः - सब ऋग्वेद आदि वेदपृथिवी आदि पञ्चभूत, सद्व्यवहार और सत्कर्मी पुरुष और सब प्राणी परमात्मा केअनुशासनगामी हैं ॥१०॥
टिप्पणी: १०−(तम्) व्रात्यं परमात्मानम् (यज्ञायज्ञियम्) अ०८।१०(२)।६। यज्ञायज्ञ-घ प्रत्ययः। सर्वेभ्यो यज्ञेभ्यो हितं वेदज्ञानम् (च) (वामदेव्यम्) अ० ४।३४।१। वामदेवाड् ड्यड्ड्यौ। पा० ४।२।९। वामदेव-ड्य। वामदेवेनश्रेष्ठपरमेश्वरेण विज्ञापितं पृथिव्यादिभूतपञ्चकम् (च) (यज्ञः) पूजनीयव्यवहारः (च) (यजमानः) पूजनीयव्यवहारकर्ता (च) (पशवः) जन्तवः-निरु० ११।२९। (अनुव्यचलन्)अनुसृत्य विचरितवन्तः ॥
