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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर की सर्वत्र व्यापकता का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [व्रात्यपरमात्मा] (उत् अतिष्ठत्) खड़ा हुआ (सः) वह (प्राचीम्) सामनेवाली [अथवा पूर्व] (दिशम् अनु) दिशा की ओर (वि अचलत्) विचरा ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमात्मा कोअपने सामने वा पूर्व दिशा में व्यापक जानकर आगे को प्रवृत्ति करे ॥१॥इस सूक्तमें परमात्मा के विराट् रूप का वर्णन है ॥
टिप्पणी: १−(सः) व्रात्यः परमात्मा (उदतिष्ठत्)प्रादुरभवत् (सः) (प्राचीम्) अ० ३।२६।१। अभिमुखीभूताम् पूर्वाम् (दिशम्) दिशाम् (अनु) अनुलक्ष्य (वि) विविधम् (अचलत्) अचरत् ॥
