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अ॑होरा॒त्रेनासि॑के॒ दिति॒श्चादि॑तिश्च शीर्षकपा॒ले सं॑वत्स॒रः शिरः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अहोरात्रे इति । नासिके इति । दिति: । च । अदिति: । च । शीर्षकपाले इति शीर्षऽकपाले । सम्ऽवत्सर: । शिर: ॥१८.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:18» पर्यायः:0» मन्त्र:4


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

व्रात्य के सामर्थ्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [इस व्रात्य के] (नासिके) दो नथने (अहोरात्रे) दिन रात्रि, (च) और (शीर्षकपाले) मस्तक के दोनोंखोपड़े (दितिः) दिति [खण्डित विकृति अर्थात् विनश्वर सृष्टि] (च) और (अदितिः)अदिति [अखण्डित प्रकृति अर्थात् नाशरहित जगत् सामग्री] हैं और [उसका] (शिरः) शिर (संवत्सरः) संवत्सर [कालज्ञान] है ॥४॥
भावार्थभाषाः - संन्यासी अपने नथनेश्वास-प्रश्वास के मार्गों को दिन-रात्रि के समान बहुत बड़ा मान कर मस्तक केखोपड़ों में सृष्टि और प्रकृति के नियमों को और मस्तक के भीतर कालज्ञान प्राप्तकरता है अर्थात् वह अपनी स्वस्थ सचेत इन्द्रियों द्वारा समस्त संसार के ज्ञान कोग्रहण करता है ॥४॥
टिप्पणी: ४−(अहोरात्रे) रात्रिदिने (नासिके) नासाच्छिद्रे (दितिः)खण्डिता विकृतिः। विनश्वरा सृष्टिः (च) (अदितिः) अखण्डिता विनाशरहिता प्रकृतिः।जगत्सामग्री (शीर्षकपाले) शिरोऽस्थिनी (संवत्सरः) सवत्सरज्ञानमित्यर्थः ॥