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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
व्रात्य के सामर्थ्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो (अस्य) इस [व्रात्य] का (दक्षिणः) दाहिना (कर्णः) कान है, (सः) सो (अयम्) यह (अग्निः)व्यापक अग्नि है, (यः) जो (अस्य) इस का (सव्यः) बायाँ (कर्णः) कान है, (सः) सो (अयम्) यह (पवमानः) शोधक वायु है ॥३॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् अतिथि अपनेस्वस्थ सचेत कानों द्वारा विद्याओं का श्रवण करके अग्निसमान व्यापक और पवन केसमान दोषनाशक होकर संसार में सुख बढ़ाता है ॥३॥
टिप्पणी: ३−(यः) (अस्य) व्रात्यस्य (दक्षिणः) अवामः (कर्णः) श्रोत्रम् (अयम्) (सः) (अग्निः) व्यापकोऽग्निः (सव्यः)वामः (पवमानः) दोषशोधको वायुः। अन्यद् गतं स्पष्टं च ॥
