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तस्य॒व्रात्य॑स्य।योऽस्य॑ चतु॒र्थो व्या॒नस्तानि॒ नक्ष॑त्राणि ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तस्य । व्रात्यस्य । य: । अस्य । चतुर्थ: । विऽआन: । तानि । नक्षत्राणि ॥१७.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:17» पर्यायः:0» मन्त्र:4


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

व्रात्य के सामर्थ्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) इस [व्रात्य] का (चतुर्थः) चौथा (व्यानः) व्यान [सब शरीर में फैला हुआ वायु] है, (तानि) वे (नक्षत्राणि) चलनेवाले तारागण हैं [अर्थात् वह तारागणों के परस्पर आकर्षण रखने, अपने-अपने मार्ग पर चलने और उछलने-डूबने आदि का ज्ञान बताता है] ॥४॥
भावार्थभाषाः - सत्यव्रतधारी महात्माअतिथि संन्यासी अपने प्रत्येक व्यान वायु की चेष्टा में संसार का उपकार करताहै, जैसे वह प्रथम व्यान में भूमिविद्या, दूसरे में अन्तरिक्षविद्या, तीसरे मेंसूर्यविद्या वा आकाशविद्या, चौथे में नक्षत्रविद्या, पाँचवें में वसन्त आदिऋतुविद्या, छठे में ऋतुओं में उत्पन्न पुष्प फल आदि पदार्थविद्या और सातवें मेंसंवत्सर अर्थात् काल की उपभोगविद्या का उपदेश करता है ॥१-७॥
टिप्पणी: ४−(नक्षत्राणि)अमिनक्षियजिवधिपतिभ्योऽत्रन्। उ० ३।१०५। णक्ष गतौ-अत्रन्। गतिशीलानां तारागणानांपरस्पराकर्षणादिज्ञानम्। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥