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तस्य॒व्रात्य॑स्य। योऽस्य॑ सप्त॒मः प्रा॒णोऽप॑रिमितो॒ नाम॒ ता इ॒माः प्र॒जाः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तस्य । व्रात्यस्य । य: । अस्य । सप्तम: । प्राण: । अपरिऽमित: । नाम । ता: । इमा: । प्रऽजा: ॥१५.९॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:15» पर्यायः:0» मन्त्र:9


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

अतिथि के सामर्थ्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) उस [व्रात्य] का (सप्तमः) सातवाँ (प्राणः) प्राण [श्वास] (अपरिमितः) अपरिमित [असीम] (नाम) नामहै, (ताः) सो (इमाः प्रजाः) यह प्रजाएँ हैं [अर्थात् वह समझाता है कि परमात्माकी सृष्टि में भूलोक, चन्द्रलोक, सूर्यलोक आदि के मनुष्य, जीव-जन्तुओं कासम्बन्ध आपस में और दूसरे लोकवालों से क्या रहता है] ॥९॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् मस्तक के सातछिद्रों द्वारा [मन्त्र १, २ देखो] प्रथम श्वास में विद्या, दूसरे मेंसूर्यविद्या, तीसरे में चन्द्रविद्या, चौथे में वायुविद्या, पाँचवें मेंजलविद्या, छठे में पशुविद्या, और सातवें में प्रजाओं के परस्पर संघटन की विद्याका प्रकाश करता है, अर्थात् वह बहुत शीघ्र मन की वृत्तियों को वश में करकेप्रत्येक इन्द्रिय से प्रत्येक श्वास में संसार का उपकार करता है॥३-९॥
टिप्पणी: ९−(अपरिमितः) अगणितः (प्रजाः) सङ्घटनविद्याः। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥