देवता: भुरिक् प्राजापत्या अनुष्टुप्
ऋषि: अध्यात्म अथवा व्रात्य
छन्द: अथर्वा
स्वर: अध्यात्म प्रकरण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि के सामर्थ्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) इस [व्रात्य] का (षष्ठः) छठा (प्राणः) प्राण [श्वास] (प्रियः) [प्रीतिकारक] (नाम) नाम है, (ते)सो (इमे पशवः) ये पशु हैं [अर्थात् वह जताता है कि गौ अश्व आदि जीव पृथिवीलोकऔर दूसरे लोकों में कैसे उपकारी होते हैं] ॥८॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र ९ पर देखो॥८॥
टिप्पणी: ८−(प्रियः) प्रीतिकरः (पशवः) गवाश्वादयः। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥
