देवता: भुरिक् प्राजापत्या अनुष्टुप्
ऋषि: अध्यात्म अथवा व्रात्य
छन्द: अथर्वा
स्वर: अध्यात्म प्रकरण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि के सामर्थ्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) इस [व्रात्य] का (चतुर्थः) चौथा (प्राणः) प्राण [श्वास] (विभूः) विभू [व्यापक] (नाम) नाम है, (सः) सो (अयं पवमानः) यह पवमान [शोधक वायु] है [अर्थात् वह बताता है कि वायुक्या है और उस का प्रभाव सब जीवों, सब पृथिवी, सूर्य आदि लोकों पर क्या होता है]॥६॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र ९ पर देखो॥६॥
टिप्पणी: ६−(विभूः) व्यापकः (पवमानः) शोधकवायुविद्या। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥
