पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि के सामर्थ्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) इस [व्रात्य] का (प्रथमः) पहिला (प्राणः) प्राण [श्वास] (ऊर्ध्वः) ऊर्ध्व [ऊँचा] (नाम) नाम है, (सः) सो (अयम् अग्निः) यह अग्नि है [अर्थात् वह शारीरिक, पार्थिव, समुद्रीय, गुप्त प्रकट बिजुली आदि अग्निविद्याओं का प्रकाशक होता है] ॥३॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र ९ पर देखो॥३॥
टिप्पणी: ३−(प्रथमः) आद्यः (ऊर्ध्वः) उन्नतः (अग्निः) अग्निविद्याप्रकाशः। अन्यत्पूर्ववत् स्पष्टं च ॥
