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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथिके उपकार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [व्रात्यअतिथि] (यत्) जब (सर्वान्) सब (अन्तर्देशान् अनु) बीचवाले देशों की ओर (व्यचलत्)विचरा, वह (परमेष्ठी) परमेष्ठी [सबसे ऊँचे पदवाला] (भूत्वा) होकर और (ब्रह्म)परब्रह्म [जगदीश्वर] को (अन्नादम्) जीवनरक्षक (कृत्वा) करके (अनुव्यचलत्)लगातार चला गया ॥२३॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १, २ के समान॥२३, २४॥
टिप्पणी: २३, २४−(सर्वान्)समस्तान् (अन्तर्देशान्) मध्यदेशान् (परमेष्ठी) सर्वोपरिपदस्थः (ब्रह्म)परमात्मानम् (ब्रह्मणा) परमात्मना सह। अन्यत् पूर्ववत्-म० १, २ ॥
