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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथिके उपकार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [व्रात्यअतिथि] (यत्) जब (प्रजाः अनु) प्रजाओं [प्राणियों] की ओर (व्यचलत्) विचरा, वह (प्रजापतिः) प्रजापति [प्राणियों का रक्षक] (भूत्वा) होकर और (प्राणम्) प्राण [आत्मबल] को (अन्नादम्) जीवनरक्षक (कृत्वा) करके (अनुव्यचलत्) लगातार चला गया॥२१॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १, २ के समान॥२१, २२॥
टिप्पणी: २१, २२−(प्रजाः)जीवान् (प्रजापतिः) जीवपालः (प्राणम्) आत्मबलम् (प्राणेन) आत्मबलेन। अन्यत्पूर्ववत्-म० १, २ ॥
