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मन॑सान्ना॒देनान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मनसा । अन्नऽअदेन । अन्नम् । अत्ति । य: । एवम् । वेद ॥१४.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:14» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

अतिथिके उपकार का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अन्नादेन) जीवनरक्षक (मनसा) मन के साथ वह [अतिथि] (अन्नम्) जीवन की (अत्ति) रक्षा करता है, (यः) जो (एवम्) व्यापक परमात्मा को (वेद) जानता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - ब्रह्मज्ञानी विद्वान्अतिथि अपने लगातार सदुपदेशों सत्कर्मों और सत्पराक्रमों से लोगों को बलवान् करकेसंसार की रक्षा करता है ॥१, २॥
टिप्पणी: २−(मनसा) अन्तःकरणेन (अन्नादेन) म० १। जीवनरक्षकेण (अन्नम्) कॄवृजॄसिद्रुपन्यनि०। उ० ३।१०। अन जीवने-न प्रत्ययः, नित्। जीवनम् (अत्ति)अद भक्षणे अवने च, अदादिः-इति शब्दस्तोममहानिधिः। अवति रक्षति (यः) अतिथिः (एवम्) इण् गतौ-वन्। व्यापकं परमात्मानम् (वेद) जानाति ॥