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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथिके उपकार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [व्रात्यअतिथि] (यत्) जब (पितॄन् अनु) पितरों [पालनकर्ता बड़े लोगों की ओर] (व्यचलत्)विचरा, वह (यमः) न्यायी (राजा) राजा (भूत्वा) होकर और (स्वधाकारम्) अपने धारणसामर्थ्य को (अन्नादम्) जीवनरक्षक (कृत्वा) करके (अनुव्यचलत्) लगातार चला गया॥१३॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १, २ के समान॥१३, १४॥
टिप्पणी: १३, १४−(पितॄन्)पालकान् महापुरुषान् (यमः) न्यायी (राजा) प्रजाशासकः (स्वधाकारम्)स्वधारणसामर्थ्यम् (स्वधाकारेण) स्वधारणसामर्थ्येन। अन्यत् पूर्ववत्-म० १, २ ॥
