वांछित मन्त्र चुनें

तद्यस्यै॒वंवि॒द्वान्व्रात्योऽप॑रिमिता॒ रात्री॒रति॑थिर्गृ॒हे वस॑ति॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तत् । तस्य । एवम् । विद्वान् । व्रात्य: । अपरिऽमिता: । रात्री: । अतिथि: । गृहे । वसति ॥१३.९॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:13» पर्यायः:0» मन्त्र:9


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

अतिथि और अनतिथि के विषय का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (तत्) सो (एवम्)व्यापक परमात्मा को (विद्वान्) जानता हुआ (व्रात्यः) व्रात्य [सत्यव्रतधारी] (अतिथिः) अतिथि (अपरिमिताः) असंख्य (रात्रीः) रात्रियों (यस्य) जिस के (गृहे) घरमें (वसति) बसता है ॥९॥
भावार्थभाषाः - जब मनुष्य को बड़ेविद्वान् अतिथि से बहुत दिनों सत्सङ्ग करने का अवसर मिले, तो वह उससेब्रह्मविद्या, राज्यविद्या आदि अनेक शुभविद्याएँ प्राप्त करके उन्नति करे ॥९, १०॥
टिप्पणी: ९, १०−(अपरिमिताः)असंख्याताः (रात्रीः) (लोकाः) दर्शनीयाः॥