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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि और अनतिथि के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पुण्यानाम्) पवित्रजनों के (ये) जो (पुण्याः) पवित्र (लोकाः) लोक [दर्शनीय समाज] हैं, (तान्) उनको (एव) निश्चय करके (तेन) उस [अतिथि सत्कार] से वह [गृहस्थ] (अव रुन्द्धे)सुरक्षित करता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य सुअवसर कोग्रहण करके अतिथि विद्वान् से उत्तम मनुष्यों के सभ्यता आदि गुण ग्रहण करे ॥७, ८॥
टिप्पणी: ७, ८−(पुण्यानाम्)पवित्रजनानाम्। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥
