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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि और अनतिथि के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तत्) सो (एवम्)व्यापक परमात्मा को (विद्वान्) जानता हुआ (व्रात्यः) व्रात्य [सत्यव्रतधारी] (अतिथिः) अतिथि (चतुर्थी) चौथी (रात्रीम्) रात्रि (यस्य) जिस [गृहस्थ] के (गृहे)घर में (वसति) बसता है ॥७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य सुअवसर कोग्रहण करके अतिथि विद्वान् से उत्तम मनुष्यों के सभ्यता आदि गुण ग्रहण करे ॥७, ८॥
टिप्पणी: ७, ८−(पुण्यानाम्)पवित्रजनानाम्। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥
