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ये दि॒वि पुण्या॑लो॒कास्ताने॒व तेनाव॑ रुन्द्धे॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ये । दिवि । पुण्या: । लोका: । तान् । एव । तेन । अव । रुन्ध्दे ॥१३.६॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:13» पर्यायः:0» मन्त्र:6


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

अतिथि और अनतिथि के विषय का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (दिवि) सूर्यलोक में (ये) जो (पुण्याः) पवित्र (लोकाः) लोक [दर्शनीय समाज] हैं, (तान्) उनको (एव)निश्चय करके (तेन) उस [अतिथिसत्कार] से वह [गृहस्थ] (अव रुन्द्धे) सुरक्षितकरता है ॥६॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ महामान्य अतिथिसे तीसरी रात्रि ठहरा कर सूर्यमण्डल का ज्ञान अर्थात् उपकारी ज्योतिष विद्या कोप्राप्त करे ॥५, ६॥
टिप्पणी: ५, ६−(दिवि)सूर्यमण्डले। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥