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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि और अनतिथि के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तत्) सो (एवम्)व्यापक परमात्मा को (विद्वान्) जानता हुआ (व्रात्यः) व्रात्य [सत्यव्रतधारी] (अतिथिः) अतिथि (तृतीयाम्) तीसरी (रात्रिम्) रात्रि (यस्य) जिस [गृहस्थ] के (गृहे) घर में (वसति) वसता है ॥५॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ महामान्य अतिथिसे तीसरी रात्रि ठहरा कर सूर्यमण्डल का ज्ञान अर्थात् उपकारी ज्योतिष विद्या कोप्राप्त करे ॥५, ६॥
टिप्पणी: ५, ६−(दिवि)सूर्यमण्डले। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥
