वांछित मन्त्र चुनें

ये॒न्तरि॑क्षे॒पुण्या॑ लो॒कास्ताने॒व तेनाव॑ रुन्द्धे ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ये । अन्तरिक्षे । पुण्या: । तेन । अव । रुन्ध्दे ॥१३.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:13» पर्यायः:0» मन्त्र:4


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

अतिथि और अनतिथि के विषय का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अन्तरिक्षे)अन्तरिक्ष में (ये) जो (पुण्याः) पवित्र (लोकाः) लोक [दर्शनीय समाज] हैं (तान्)उनको (एव) निश्चय करके (तेन) उस [अतिथिसत्कार] से वह [गृहस्थ] (अव रुन्द्धे)सुरक्षित करता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ यथावत् सत्कारसे अतिथि को दूसरे दिन ठहराकर उससे अन्तरिक्षविद्या प्राप्त करे ॥३, ४॥
टिप्पणी: ३, ४−(अन्तरिक्षे)भूलोकसूर्यमध्यवर्तिनि लोके। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥