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ये पृ॑थि॒व्यांपुण्या॑ लो॒कास्ताने॒व तेनाव॑ रुन्द्धे॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ये । पृथिव्याम् । पुण्या: । लोका: । तान् । एव । तेन । अव । रुन्ध्दे ॥१३.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:13» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

अतिथि और अनतिथि के विषय का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (पृथिव्याम्) पृथिवीपर (ये) जो (पुण्याः) पवित्र (लोकाः) लोक [दर्शनीय समाज] हैं, (तान्) उन समाजोंको (एव) निश्चय करके (तेन) उस [अतिथिसत्कार] से वह [गृहस्थ] (अव रुन्द्धे)सुरक्षित करता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् गृहस्थ पुरुषआप्त सदाचारी अतिथि को एक दिन ठहरा कर उससे उपकारी भूमिविद्या ग्रहण करके लोगोंमें प्रतिष्ठा पावे ॥१, २॥
टिप्पणी: २−(ये) (पृथिव्याम्) भूम्याम् (पुण्याः) पवित्राः।उपकारिणः (लोकाः) दर्शनीयाः समाजाः (तान्) (एव) निश्चयेन (तेन) अतिथिसत्कारेण (अव रुन्द्धे) सुरक्षति ॥