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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि और अनतिथि के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - वह [गृहस्थ] (एनम्) उस [झूठे व्रात्य] को (कर्षेत्) तिरस्कार करे, (न) अव (च) निश्चय करके (एनम्) उस [मिथ्याचारी] को (कर्षेत्) तिरस्कार करे ॥१२॥
भावार्थभाषाः - यदि कोई छली-कपटीमिथ्यावादी मनुष्य अपने को सत्यव्रतधारी अतिथि बताकर आजावे, गृहस्थ उस पाखण्डीधूर्त को अवश्य निरादर करके निकाल देवे, और अगले दो मन्त्रों के अनुसार वर्तावकरे ॥११, १२॥
टिप्पणी: १२−(कर्षेत्) कृष विलेखने-विधिलिङ्। अवकर्षेत्। तिरस्कुर्यात्।दण्डयेत् (एनम्) कुव्रात्यम् (न) सम्प्रति-निरु० ७।३१। (च) अवधारणे (एनम्)अव्रात्यम् (कर्षेत्) तिरस्कुर्यात् ॥
